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School Homework Negative Effects; Students Mental Health | Sleep Deprivation | रिलेशनशिप- होमवर्क के बोझ से दबे बच्चे: बच्चों पर पढ़ाई का बोझ न लादें, खेलकूद भी है जरूरी, साइकोलॉजिस्ट के 8 सुझाव

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10 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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“बेटा होमवर्क कर लो, फिर टीवी देखना। होमवर्क कर लो, फिर खेलना।”

आपने अक्सर पेरेंट्स द्वारा अपने बच्चों को ऐसी हिदायतें देते देखा या सुना होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ज्यादा होमवर्क बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कई बार स्कूल से बच्चों को इतना ज्यादा होमवर्क दे दिया जाता है कि वे उसी में परेशान रहते हैं। उन्हें खेलने-कूदने तक का मौका नहीं मिल पाता है। इससे उन्हें मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।

वहीं बहुत से पेरेंट्स अपनी बिजी लाइफ के चलते बच्चों के स्कूल या होमवर्क पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसे में पढ़ाई और होमवर्क का प्रेशर बच्चों को किताबी कीड़ा बना देता है। वे बाहर की दुनिया से कम परिचित हो पाते हैं।

इसलिए आज रिलेशनशिप कॉलम में हम बच्चों के होमवर्क प्रेशर के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • ज्यादा होमवर्क बच्चों की मेंटल हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है?
  • बच्चों को होमवर्क प्रेशर से कैसे बचाया जा सकता है?

ज्यादा होमवर्क बच्चों को बना रहा बीमार

साल 2013 में जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एजुकेशन में एक स्टडी पब्लिश हुई। कैलिफोर्निया के 4300 से अधिक स्टूडेंट्स पर हुई इस रिसर्च में पाया गया कि ज्यादातर बच्चे हर रात औसतन 3 घंटे से अधिक समय तक होमवर्क कर रहे थे। इससे उनको मानसिक तनाव समेत कई तरह की फिजिकल हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो रही थीं।

स्कूलों में दिए जाने वाले ज्यादा और कठिन होमवर्क बच्चों की फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर नेगेटिव असर डालते हैं। जहां एक ओर बच्चों को स्कूल के बाद आराम और खेल की जरूरत होती है, वहीं ज्यादा होमवर्क उनके लिए मानसिक तनाव और थकान समेत कई तरह के हेल्थ इशू का कारण बनता है।

ज्यादा होमवर्क का बच्चों की सेहत पर कैसा प्रभाव पड़ता है, इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-

बच्चों को होमवर्क प्रेशर से बचाना जरूरी

होमवर्क स्कूल का वह काम है, जिसे बच्चों को घर पर पूरा करना होता है। इसका उद्देश्य बच्चों द्वारा स्कूल में सीखी गई बातों का अभ्यास करना है। इसलिए होमवर्क बच्चों के लिए जरूरी है। लेकिन ज्यादा होमवर्क उन्हें बीमार कर सकता है। सरकार ने बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए होमवर्क को लेकर कुछ नियम बनाए हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मुताबिक, कक्षा 2 तक के बच्चों को कोई होमवर्क नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं क्लास 3 से 5 तक के बच्चों को हफ्ते में सिर्फ 2 घंटे और 6 से 8 तक के बच्चों को हर दिन 1 घंटे से ज्यादा का होमवर्क नहीं दिया जाना चाहिए। 10वीं से 12वीं क्लास के स्टूडेंट्स को हर दिन 2 घंटे तक का होमवर्क दिया जा सकता है।

हालांकि बहुत से स्कूल इन मानकों को फॉलो नहीं करते हैं और वे बच्चों को इससे ज्यादा होमवर्क देते हैं। ऐसे में अगर आपका बच्चा होमवर्क को लेकर ज्यादा परेशान रहता है तो इसके लिए स्कूल में बात करना जरूरी है। इसके अलावा कुछ बातों को ध्यान में रखकर पेरेंट्स अपने बच्चे के होमवर्क प्रेशर से बचा सकते हैं, इसे नीचे ग्राफिक से समझिए-

बच्चों के लिए सही स्कूल का करें चयन

आजकल पेरेंट्स अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए उसे अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए वह अच्छी-खासी रकम भी खर्च करते हैं। लेकिन कई बार स्कूलों के चयन में जल्दबाजी से बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल पाती है। ऐसे में बच्चों के लिए स्कूल का चयन करते समय कई बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसे नीचे पॉइंटर्स से समझिए-

  • स्कूल की तलाश शुरू करने से पहले यह तय कर लें कि आप अपने बच्चे के लिए कैसा स्कूल चाहते हैं।
  • अगर आप प्ले स्कूल में बच्चे का एडमिशन कराने की सोच रहे हैं तो देखें कि स्कूल में बच्चे के लिए खेलने की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं।
  • ये भी देखें कि स्कूल में प्ले ग्राउंड, लाइब्रेरी, प्रैक्टिकल लैब, स्पोर्ट्स-म्यूजिक और डांस क्लास जैसी सुविधाएं हैं या नहीं।
  • ये जानकारी भी लें कि स्कूल किस बोर्ड से संबद्ध है। जैसेकि CBSE, ICSE या राज्य बोर्ड।
  • स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता, ट्रेनिंग और उनके अनुभव के बारे में पूछताछ करें।
  • स्कूल फीस, स्कूल के माहौल, स्कूल में बच्चों की सुरक्षा और आने-जाने की सुविधा जैसी जानकारी भी लें।
  • इन सबके अलावा स्कूल मैनेजमेंट से पढ़ाने के तरीके और होमवर्क कल्चर के बारे में जरूर पूछताछ करें।

बच्चों के जीवन में पढ़ाई के अलावा इन चीजों की भी है भूमिका

बच्चों के जीवन में पढ़ाई की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही खेलने-कूदने, घूमने और परिवार के साथ समय बिताने की भी है। इससे उनमें सोशल स्किल डेवलप होता है। इसके साथ ही वे फिजिकली और मेंटली फिट रहते हैं। इसलिए बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ ही प्रकृति और अन्य चीजों से भी परिचित कराएं।

बच्चे को स्कूल भेजने की सही उम्र

भारत की नई शिक्षा नीति 2020 के मुताबिक, 6 साल से कम उम्र के बच्चों को पहली क्लास में एडमिशन नहीं मिल सकता। 3 से 6 साल के बच्चों का प्री-स्कूल यानी प्ले स्कूल, यूकेजी या एलकेजी में एडमिशन करवा सकते हैं। वहीं स्कूल टाइमिंग की बात करें तो छोटे बच्चों का स्कूल 5 घंटे तो बड़ों का लगभग 6 घंटे होता है।

बच्चों को रोजाना कितनी देर खेलना चाहिए

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 5 से 17 साल की उम्र तक के बच्चों को सप्ताह में रोजाना कम-से-कम 60 मिनट की फिजिकल एक्टविटीज करना या कोई भी पसंदीदा खेल खेलना चाहिए। इससे वे शारीरिक और मानसिक तौर पर फिट रहेंगे।

खेल बच्चे को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह उनके इम्यून सिस्टम व शरीर को मजबूत बनाता है और दिमाग को तेज रखता है। इसलिए हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि जिस स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराएं, वहां खेलने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।

अंत में यही कहेंगे कि आज के दौर में समाज और पेरेंट्स दोनों ही बच्चों से कम उम्र में ज्यादा स्किल्स सीखने की उम्मीद करते हैं। बच्चों को स्कूल के अलावा कई दूसरी क्लासेज में भेजना जरूरी सा हो गया है। ऐसे समय में बच्चों की फिजिकल, मेंटल और इमोशनल हेल्थ का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें।

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