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Pune GBS Outbreak; Guillain-Barre Syndrome Symptoms Explained | सेहतनामा- पुणे में मिले गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के 20 केस: चलना, उठना, सांस लेना होता मुश्किल, डॉक्टर से जानिए ये बीमारी कितनी खतरनाक

2 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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पुणे में मात्र एक हफ्ते में गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) के 20 से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आ चुके हैं। कई अस्पतालों ने डाइग्नोसिस के लिए ब्लड, स्टूल, लार, यूरिन और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) के सैंपल ICMR और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के साथ भी शेयर किए हैं।

GBS एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। इसमें हमारा इम्यून सिस्टम अपनी ही नर्व्स पर अटैक कर देता है। इससे न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर हो जाता है। इसके कारण हाथ-पैर अचानक कमजोर पड़ जाते हैं। उठना-बैठना तक मुश्किल हो जाता है।

यह एक रेयर सिंड्रोम है। हर साल पूरी दुनिया में इसके लगभग एक लाख मामले सामने आते हैं। पुणे में हफ्ते भर के अंदर 20 सस्पेक्टेड केस का मिलना चिंता का विषय हो सकता है। साल 2023 में दक्षिण अमेरिका के देश पेरू में 1 जून से 15 जुलाई के बीच इस बीमारी के 180 मामले दर्ज किए गए थे। इससे निपटने के लिए वहां की सरकार को 90 दिनों के लिए हेल्थ इमरजेंसी लगानी पड़ी थी। यही कारण है कि पुणे में एक साथ इतने मामले सामने आने से लोग डर रहे हैं।

इसलिए ‘सेहतनामा’ में आज गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • इसके लक्षण क्या हैं?
  • यह सिंड्रोम कितना घातक है?
  • इसका इलाज और बचाव क्या है?

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम क्या है?

यह एक ऑटोइम्यून न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसमें इम्यून सिस्टम पेरिफेरल नर्वस सिस्टम की नर्व्स पर अटैक कर देता है। इसके कारण लोगों का उठना-बैठना, चलना-फिरना और यहां तक कि सांस लेना तक मुश्किल हो सकता है।

हमारे नर्वस सिस्टम के दो भाग होते हैं। पहला है सेंट्रल नर्वस सिस्टम, जिसमें रीढ़ की हड्डी और ब्रेन होता है। दूसरा है, पेरिफेरल नर्वस सिस्टम, जिसमें पूरे शरीर की अन्य सभी नर्व्स होती हैं। गुइलेन-बैरे सिंड्रोम में इम्यून सिस्टम नर्वस सिस्टम के दूसरे हिस्से यानी पेरिफेरल नर्वस सिस्टम पर ही हमला करता है।

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के लक्षण क्या हैं?

पेरिफेरल नर्वस सिस्टम की नर्व्स ब्रेन को शरीर के बाकी हिस्सों से कनेक्ट करती हैं और मसल्स समेत कई ऑर्गन्स के फंक्शन को कंट्रोल करती हैं। इनके डैमेज होने से ब्रेन से आ रहे मैसेज मसल्स तक नहीं पहुंच पाते हैं। इससे मसल्स पर कंट्रोल खत्म होने लगता है। इसलिए जब पेशेंट उठना चाहते हैं या चलना चाहते हैं तो नहीं चल पाते हैं।

आमतौर पर इसका सबसे पहला लक्षण ये है कि इसमें पैर की उंगलियों में झुनझुनी शुरू होती है। इसके बाद यह पूरे पंजे में, फिरे पूरे पैर में और इसी क्रम में ऊपर की ओर पूरे शरीर में फैलती जाती है। इसके लक्षण तेजी से बढ़ सकते हैं। इसमें और क्या लक्षण दिख सकते हैं, ग्राफिक में देखिए:

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के क्या कॉम्प्लिकेशन हो सकते हैं

अगर GBS ऑटोनॉमिक नर्व्स को डैमेज कर रहा है तो इससे किसी की मौत भी हो सकती है। हमारी ऑटोनॉमिक नर्व्स हार्ट बीट, ब्लड प्रेशर और डाइजेशन जैसे ऑटोमैटिक बॉडी फंक्शंस को कंट्रोल करती हैं। इन फंक्शंस के अनियंत्रित होने पर कोई बहुत देर तक जीवित नहीं रह सकता है। इसके कारण कैसी कंडीशन बन सकती हैं, ग्राफिक में देखिए।

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम का इलाज क्या है?

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, इसके लक्षणों को कम करने के लिए ट्रीटमेंट किया जाता है।

ट्रीटमेंट में डॉक्टर कौन सी थेरेपी देते हैं?

आमतौर पर डॉक्टर ये 2 थेरेपी देते हैं:

  • प्लाज्मा एक्सचेंज

इस ट्रीटमेंट में ब्लड से प्लाज्मा को अलग करके प्योर किया जाता है। इससे उन एंटीबॉडीज को हटाया जाता है, जो नर्व सेल्स पर अटैक कर रही हैं। इसके बाद ब्लड और प्लाज्मा को फिर से शरीर में डाल दिया जाता है।

  • इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन थेरेपी

इस थेरेपी में हेल्दी डोनर से एंटीबॉडीज लेकर पेशेंट को दी जाती हैं। ये एंटीबॉडीज शरीर के इम्यून सिस्टम को संतुलित करती हैं। इससे नर्व सेल्स पर हो रहे अटैक को कम किया जा सकता है।

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम से जुड़े कुछ कॉमन सवाल और जवाब

सवाल: गुइलेन-बैरी सिंड्रोम क्यों होता है?

जवाब: गुइलेन-बैरी सिंड्रोम का सटीक कारण अभी तक नहीं मालूम है। आमतौर पर इसके लक्षण किसी रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन या डाइजेस्टिव इन्फेक्शन के कुछ दिनों या हफ्तों बाद दिखाई देते हैं। कई बार किसी सर्जरी या वैक्सिनेशन के बाद भी GBS ट्रिगर कर सकता है। इसका मतलब ये है कि किसी रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन को और डायरिया जैसे डाइजेस्टिव इन्फेक्शन को हल्के में न लें।

सवाल: क्या गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के कारण किसी की मौत भी हो सकती है?

जवाब: हां, इसमें कुछ मामलों में अगर लक्षण बहुत तेजी से बढ़ते हैं तो पेशेंट को समय पर इलाज नहीं मिलने पर उसकी मौत भी हो सकती है। इसके अलावा अगर एंटीबॉडीज ऑटोनॉमिक नर्व्स को डैमेज कर देती हैं तो भी मौत का जोखिम बढ़ जाता है। इसके कारण हार्ट बीट, ब्लड प्रेशर और डाइजेस्टिव सिस्टम कंट्रोल से बाहर हो जाता है और पेशेंट की मौत हो जाती है। हालांकि, ऐसा बहुत कम मामलों में होता है।

सवाल: गुइलेन-बैरे सिंड्रोम में लाइफ एक्सपेक्टेंसी कितनी है?

जवाब: जो लोग इससे रिकवर हो जाते हैं, वे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं। इसमें 2% से भी कम लोगों की मौत होती है। मरने वालों में ज्यादातर वे लोग होते हैं, जिनके लक्षण बहुत गंभीर हो गए हैं।

सवाल: इस बीमारी का जोखिम किसे ज्यादा है?

जवाब: GBS किसी को भी हो सकता है, लेकिन इसके मामले सबसे ज्यादा 30 से 50 साल की उम्र को लोगों में देखने को मिलते हैं।

सवाल: गुइलेन-बैरे के लक्षण कितने दिनों में ठीक हो जाते हैं?

जवाब: गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के लक्षण ट्रीटमेंट और टाइम के साथ ठीक होते हैं। ज्यादातर लोगों के लक्षण 2 से 3 हफ्ते में ठीक होने लगते हैं। लक्षण गंभीर होने पर रिकवरी टाइम कुछ महीनों से लेकर 1 साल या उससे ज्यादा भी हो सकता है।

सवाल: गुइलेन-बैरे सिंड्रोम से बचाव के क्या उपाय हैं?

जवाब: गुइलेन-बैरे सिंड्रोम से बचाव का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि इसको होने की सटीक वजह नहीं मालूम है। चूंकि ज्यादातर मामलों में ये किसी इन्फेक्शन के बाद विकसित होता है तो इसका जोखिम कम करने के लिए जितना संभव हो सके, सेहत का ख्याल रखें और स्वस्थ बने रहें। ……………………………….

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