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Mood Disorders; Emotional Imbalance Symptoms Explained | रिलेशनशिप- क्या आप सोशल मीडिया पर झगड़ा करते हैं: कहीं आप इमोशनल इंबैलेंस का शिकार तो नहीं, साइकेट्रिस्ट से जानिए लक्षण और बचाव

25 मिनट पहलेलेखक: शशांक शुक्ला

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हाल ही में अमेरिका में चुनाव संपन्न हुए हैं। इस चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जीत हासिल हुई है। सोशल मीडिया पर ट्रंप के समर्थक जहां एक ओर खुशी में डूबे हैं। वहीं इस चुनाव परिणाम के बाद ट्रंप के विरोधी दुख और गुस्से से भरे हुए हैं।

चुनाव परिणाम के बाद सोशल मीडिया पर कमला हैरिस और ट्रंप के समर्थक एक-दूसरे पर छींटाकशी, भद्दे कमेंट्स और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करते भी देखे गए। सोशल मीडिया पर कई सारे लोग भावनाओं में बहकर ऐसा करते हैं।

जब हम भावनाओं को कंट्रोल करने के बजाय अपनी भावनाओं के कंट्रोल में होते हैं तो ओवररिएक्ट करने लग जाते हैं। यह स्थिति हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारी प्रोफेशनल ग्रोथ को नुकसान पहुंचाती है। इसके साथ ही यह स्थिति सामाजिक ताने-बाने को भी गहरा नुकसान पहुंचाती है।

आज हम रिलेशनशिप में जानेंगे कि-

  • इमोशनल इंबैलेंस क्या है?
  • इसके दुष्प्रभाव क्या हैं?
  • इमोशनल इंबैलेंस से बचने के लिए क्या करें?

इमोशनल इंबैलेंस क्या है?

इमोशनल इंबैलेंस का मतलब है, अपनी भावनाओं पर काबू न कर पाना। किसी विशेष परिस्थिति में भावनात्मक आवेगों पर कंट्रोल न रहना।

हम कभी बहुत ज्यादा गुस्सा करते हैं, तो कभी अचानक बहुत उदासी में डूब जाते हैं। साथ ही छोटी-छोटी बातों पर ओवररिएक्ट कर बैठते हैं, जो हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

ओवररिएक्शन दो प्रकार के होते हैं–

रिएक्टिव ओवररिएक्शन– रिएक्टिव ओवररिएक्शन ऐसी स्थिति है, जब किसी घटना पर आप जरूरत से अधिक प्रतिक्रिया देते हैं।

कंपल्सिव ओवररिएक्शन– वहीं, कंपल्सिव ओवररिएक्शन की स्थिति में अपनी प्रतिक्रिया पर कोई कंट्रोल नहीं होता। न चाहते हुए भी आप एक खास तरह से रिएक्ट या व्यवहार करने लगते हैं।

इमोशनल इंबैलेंस के संकेत

कभी–कभार ऐसा हो कि बहुत ज्यादा प्यार या गुस्सा आए तो यह सामान्य है। ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है। लेकिन यह कैसे पता चलेगा कि कोई अपना भावनात्मक संतुलन खो रहा है। वह इमोशनल इंबैलेंस की स्थिति में जा रहा है।

इसे समझने के लिए हमने भाेपाल के जाने–माने मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से बात की। नीचे ग्राफिक में देखिए इमोशनल इंबैलेंस के कुछ संकेत। अगर आपको अपने भीतर या अपने आसपास किसी व्यक्ति में ऐसे संकेत दिखें तो संभव है कि वह व्यक्ति इमोशनल इंबैलेंस का शिकार हो रहा है।

इमोशनल इंबैलेंस के दुष्प्रभाव क्या हैं?

इमोशनल इबैलेंस से पीड़ित होने पर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ हमारे सोशल कनेक्शन को भी नुकसान पहुंचता है।

रिश्ते में तनाव

जब हम इमोशनल इंबैलेंस से पीड़ित होते हैं तो छोटी-छोटी बातों पर ट्रिगर हो जाते हैं। ऐसे में बात-बात पर झगड़े होने से नाराजगी पैदा होती है। रिश्तों में दरार पैदा होती है। यह तनाव भावनात्मक रूप से हमें और हमारे प्रियजनों को परेशान कर सकता है।

मेंटल और फिजिकल हेल्थ पर असर

निरंतर तनाव और चिंता से मानसिक स्वास्थ्य खराब हो सकता है। इससे नींद की कमी, सिरदर्द और यहां तक कि हार्ट की समस्याएं भी हो सकती हैं।

आत्मविश्वास में कमी

इमोशनल इंबैलेंस के कारण व्यक्ति के आत्मविश्वास में कमी आती है। वह अपने निर्णयों और रिश्तों को लेकर असमंजस में रहने लगता है। और इस वजह से कई बार गलत निर्णय कर बैठता है, जो उसके पर्सनल रिलेशन के साथ ही सोशल कनेक्शन को भी बुरी तरह प्रभावित करता है।

समाज से दूरी और अलगाव

इमोशनल इंबैलेंस के चलते व्यक्ति खुद को समाज से अलग करने लगता है। वह दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने लगता है। इससे व्यक्ति के सामाजिक जीवन के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

इमोशनल इंबैलेंस से खुद को कैसे बचाएं?

इमोशनल इंबैलेंस से खुद को बचाने के लिए यहां कुछ जरूरी विकल्पों पर चर्चा करेंगे। इसमें हम अपने ट्रिगर्स को समझने के तरीके, स्थिति के मूल्यांकन और अन्य तरीकों पर बात करेंगे।

पहले नीचे ग्राफिक में साइकेट्रिस्ट के बताए कुछ सुझावों पर गौर करें–

अपने ट्रिगर्स को पहचानें

अगर हम बार–बार ओवररिएक्ट कर रहे हैं या किसी छोटी बात पर भी आपा खो रहे हैं, तो यह खतरे का संकेत है। इसका मतलब है कि हमारे साथ सबकुछ ठीक नहीं है। ऐसे स्थिति में उन बातों पर ध्यान देना चाहिए, जो हमें भावनात्मक रूप से अस्थिर करती हैं। हमें इन बातों पर पहले से ध्यान देते हुए, ऐसी किसी स्थिति में ओवररिएक्ट करने के बजाए अन्य विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए।

शांत होकर स्थिति का मूल्यांकन करें

आमतौर पर ओवररिएक्शन किसी गहरी समस्या से जुड़ा होता है। कभी-कभी हमारा ओवररिएक्शन अतीत में हुए किसी आघात से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में हमें इस तरह के ट्रॉमा को समझने, स्वीकारने और उससे हील होने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रतिक्रिया देने के बजाय, जवाब दें

जब लगे कि ओवररिएक्ट करने वाले हैं, तो रुकें और सोचें कि भावनाएं किस स्थिति या घटना से जुड़ी हुई हैं। अपने आप से पूछें कि क्या मैं ऐसी चीज पर ओवररिएक्ट कर रहा हूं, जो अतीत में हुई थी? क्या मैं ओवररिएक्ट करने के बजाय सोच-समझकर जवाब दे सकता हूं? अतीत को बदलना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन वर्तमान में अपने व्यवहार को नियंत्रित करना आपके हाथ में है।

  • ओवररिएक्शन की स्थिति में लंबी सांस लें।
  • खुद से कुछ सेंटेंस फॉर्मेशन दोहराएं, जैसे- “मैें इससे बेहतर तरीके से निपट सकता हूं।”
  • ओवरिएक्शन से पहले, एक बेहतर जवाब की कल्पना करें।

सेल्फ-कंपैशन का अभ्यास करें

खुद के प्रति सहानुभूति रखना हमें ओवररिएक्शन को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है। जब हम पर इमोशंस हावी होते हैं, तो कई बार हम खुद को कोसने लगते हैं। यदि हम ओवररिएक्शन से सीखकर अगली बार अधिक समझदारी से प्रतिक्रिया दें तो यह मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इससे हम अधिक सकारात्मक तरीके से परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

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