26 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी
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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान एक घातक बीमारी लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis) से पीड़ित हैं। भगवंत मान नियमित जांच के लिए मोहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल गए थे। वहां डॉक्टर्स को ट्रॉपिकल बुखार की आशंका हुई तो उनका ब्लड टेस्ट किया गया। इसमें लेप्टोस्पायरोसिस की पुष्टि हुई है।
लेप्टोस्पायरोसिस एक रेयर और गंभीर बीमारी है, जो लेप्टोस्पायरा नाम के बैक्टीरिया के संक्रमण से फैलती है। लेप्टोस्पायरा आमतौर पर गाय, घोड़े, कुत्ते, चूहे और सुअर जैसे कई जानवरों के यूरिन में पाया जाता है। शुरू में इसके लक्षण फ्लू जैसे होते हैं, जो बाद में घातक बीमारी वेइल सिंड्रोम में बदल सकते हैं।
सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक, पूरी दुनिया में हर साल लेप्टोस्पायरोसिस के 10 लाख मामले दर्ज होते हैं और इनमें से 60 हजार लोगों की मौत हो जाती है। हालांकि CDC का अनुमान है कि इस बीमारी के वास्तविक आंकड़े दर्ज आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अवेयरनेस कम होने के कारण यह अंडर रिपोर्टेड बीमारी है।
इसलिए आज ‘सेहतनामा’ में लेप्टोस्पायरोसिस के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- लेप्टोस्पायरोसिस के लक्षण क्या होते हैं?
- इस बीमारी का इलाज क्या है?
- इससे बचाव के उपाय क्या हैं?
लेप्टोस्पायरोसिस क्या है?
लेप्टोस्पायरोसिस एक बैक्टीरियल इन्फेक्शन है। इसमें लेप्टोस्पायरा नाम का बैक्टीरिया हमारे ब्लड स्ट्रीम के जरिए शरीर के सभी अंगों को प्रभावित कर सकता है। यह बैक्टीरिया आमतौर पर जानवरों के आसपास काम करने से, नदी-तालाब में नहाने या पानी पीने से और बागवानी करते समय फैलता है। इसके लिए ज्यादातर मामलों में 3 कारण ही जिम्मेदार हैं।
- संक्रमित जानवरों के यूरिन या रिप्रोडक्टिव फ्लूइड के सीधे संपर्क में आना।
- दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आना।
- दूषित भोजन करना या दूषित पानी पीना।
इसके इंसानों में फैलने और बॉडी ऑर्गन्स को प्रभावित करने का क्रम क्या है, ग्राफिक में देखिए।

लेप्टोस्पायरोसिस के लक्षण क्या हैं
दिल्ली के धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. नितिन राठी कहते हैं कि आमतौर पर लेप्टोस्पायरोसिस के लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं। इसमें तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दस्त और पेट दर्द की समस्या होती है। कई बार ये लक्षण कुछ लोगों में गंभीर हो सकते हैं। गंभीर मामलों में 3 से 10 दिन में पीलिया जैसे लक्षण दिखने लगते हैं।
- गंभीर मामलों में आंखों के सफेद भाग पीले दिखने लगते हैं। पेट दर्द बना रहता है और भूख कम लगने लगती है।
- इससे फेफड़े प्रभावित होने पर सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। खांसी के साथ खून आने लगता है।
- किडनी प्रभावित होने पर यूरिन की मात्रा बहुत कम हो जाती है और काले रंग का यूरिन आता है।
- इस बैक्टीरियल इन्फेक्शन के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करें क्योंकि लेप्टोस्पायरोसिस के कारण इंटरनल ब्लीडिंग हो सकती है और ऑर्गन डैमेज हो सकते हैं। कुल मिलाकर इसका इन्फेक्शन कभी भी घातक साबित हो सकता है।

लेप्टोस्पायरोसिस से सावधानी जरूरी
जानी-मानी पत्रिका नेचर में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, बीते कुछ सालों में भारत में लेप्टोस्पायरोसिस के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, तापमान में बढ़ोत्तरी जैसे कई कारण बताए गए हैं। इस बैक्टीरियल संक्रमण के ज्यादातर मामले गर्म और उमस भरे इलाकों में ही पाए जाते हैं।

लेप्टोस्पायरोसिस का इलाज क्या है?
डॉ. नितिन राठी कहते हैं कि किसी भी बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से होता है। लेप्टोस्पायरोसिस के मामले में भी एंटीबायोटिक दवाएं ही दी जाती हैं। इसके संक्रमण को दो चरणों में बांटकर इलाज किया जाता है। अगर संक्रमण हल्का है तो कम डोज की दवाएं देकर लक्षणों पर नजर रखी जाती है। इसमें कई बार तो लोग बिना किसी ट्रीटमेंट के ही ठीक हो जाते हैैं।
वहीं इसके गंभीर मामलों में पेशेंट को हॉस्पिटल में भर्ती करना जरूरी होता है। इसमें पेशेंट के लक्षणों को काबू करने में मुश्किल होती है और ड्रिप के जरिए एंटीबायोटिक्स देनी पड़ती हैं।
इसके इलाज में एंटीबायोटिक्स के अलावा और कौन सी दवाओं की जरूरत पड़ेगी, यह इस पर निर्भर करता है कि संक्रमण के कारण पेशेंट के कौन से अंग प्रभावित हुए हैं।
लेप्टोस्पायरोसिस से बचाव जरूरी है
डॉ. नितिन राठी कहते हैं कि इस बीमारी के बारे में जागरुकता की जरूरत है। अगर लोग इसके बारे में जानेंगे और समझेंगे तो बचाव के उपाय भी अपनाने लगेंगे। अगर बचाव के स्तर पर काम कर लिया जाए तो आगे बहुत मुश्किल नहीं आएगी।

लेप्टोस्पायरोसिस के संक्रमण से बचने के कितने चांस होते हैं?
डॉ. नितिन राठी कहते हैं कि लेप्टोस्पायरोसिस से ज्यादातर लोग बच जाते हैं। इसके ज्यादातर मामलों में तो कोई लक्षण ही नहीं दिखते हैं या बहुत हल्के लक्षण होते हैं, जो कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाते हैं। इसके लक्षण फ्लू से इतने मेल खाते हैं कि लोग इसे फ्लू ही समझते रहते हैं।
इससे संक्रमित सिर्फ 1% लोगों को ही गंभीर स्थितियों (वेइल सिंड्रोम) का सामना करना पड़ता है। इसमें अगर समय पर ट्रीटमेंट न किया जाए तो यह अक्सर घातक होता है। हालांकि समय पर इलाज मिल जाए तो ज्यादातर लोग ठीक हो जाते हैं।
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